उत्तराखंड, देहरादून।भारत के संविधान निर्माता डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर का परिनिर्वाण 6 दिसम्बर 1956 को हुआ था।आज ही के दिन 1992 में अयोध्या में साम्प्रदायिक एवं फूटपरस्त तत्वों द्वारा बाबरी मस्जिद नेस्तबानूद कर दिया था ,जो कि भारतीय इतिहास में काले दिवस के रूप में अंकित है।

14 अप्रैल 1891 मिथ आर्मी कैन्टोमेन्ट में जन्मे भारत के संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर तत्कालीन समाज के सर्वाधिक कमजोर परिवार से सम्बन्ध रखते थे । जो कि सदियों से सामन्ती व्यवस्था के जकड़न के साथ ही भारी भेदभाव झेलने के लिए विवश थे । सदियों से भेदभाव की पीड़ा झेल रहे दलित ,महिलाओं एवं पिछड़े समाज के बड़़े हिस्से को उन दिनों भी काफी कुछ प्रतिबन्धों को झेलना पड़ता था ,उन्हें खुलेतौर पर सार्वजनिक स्थानों पर आने जाने में भारी प्रतिबन्ध था ,उनका जीवन रूढिवादी समाज की इच्छा तथा दया पर निर्भर था । ।यह सब कुछ अम्बेडकर एवं उनके परिवार के साथ भी पीढ़ी दर पीढ़ी होता चला आ रहा था ।
दलित परिवार से होने के नाते सामन्ती व्यवस्था की कुप्रथाओं एवं शोषण, उत्पीड़न का शिकार उन्हें पल – पल सहना पड़ रहा था , शुरुआत उनके स्कूली दिनों से ही हुई । भेदभाव के बावजूद भी उन्होंने सामाजिक कुरीतियों से जुझते हुऐ अपनी पढा़ई जारी रखी ,बहुमुखी प्रतिभा के धनी अम्बेडकर शिक्षा में भी अब्बल थे ।भारी कष्टों को सहते हुऐ 1917 में कोलम्बिया विश्वविद्यालय से डायरेक्टेट की उपाधि ग्रहण कर सदियों से चली आ रही परम्परा को तोड़कर लम्बी छलांग लगाई तथा साबित किया कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन हो ,उनसे लड़ा भी जा सकता है ,और जीता भी जा सकता है।
वे सामाजिक भेदभाव के खिलाफ दलितों तथा समाज के दबे कुचले वर्ग के जागरण के लिए लिखते भी रहे तथा आन्दोलन भी करते रहे ,हिन्दू धर्म की विषमताओं के खिलाफ उन्होंने काफी कुछ लिखा, तथा हिन्दू धर्मान्धता के चलते उन्होंने बौद्ध धर्म तक को अपनाया ।
उन्होंने 1956 में बौद्ध धर्म पर टिप्पणी को लेकर सावरकर को बुरी तरह लताड़ा उन्हें समाज को विभाजित करने वाला संकीर्ण इंसान कहा।अम्बेडकर कई मायने में गाधीजी से असहमति रखते थे ,वे आधुनिक भारत के संविधान निर्माता थे जिनकी दूरदर्शिता के परिणामस्वरूप दलितों ,अल्पसंख्यकों ,महिलाओं ,आदिवासियों तथा समाज के कमजोर तबकों को शिक्षा ,नौकरियों में आरक्षण आदि का अधिकार मिला जिस कारण आज उनके जीवन स्तर में सुधार देखने को मिला ।संविधान में हरेक व्यक्ति के लिए मौलिक अधिकार का प्रावधान भी उन्हीं की देन है ।
अम्बेडकर शिक्षा को परिवर्तन का हथियार मानते थे , इसलिए वे शिक्षा पर जोर देते थे तथा दलित समाज को अपने आगे बढाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करते थे । वे इस आजादी से खुश नहीं थे क्योंकि ऐ आजादी अधूरी थी । जिसमें बुनियादी नीतियों में ज्यादा बदलाव नहीं था ।संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर हम सभी को उन ताकतों के खिलाफ संघर्ष का संकल्प लेना चाहिए, जो साम्प्रदायिक ,जातीय, आर्थिक आधार पर देश की जनता के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं तथा जिन्होंने देश को आज ऐसे जगह खड़ा करके रख दिया जहाँ आम जनता अपने आपको असहाय महसूस कर रही है ।
बाबा साहेब ने विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में आगे बढ़ने का संकल्प नहीं छोड़ा ,इसलिए आज देश की जनता को मिल जुलकर कारपोरेटपरस्त ,साम्प्रदायिक ,फूटपरस्त नीतियों तथा राजनैतिक रूप से अधिनायकवादी प्रवृति के खिलाफ एकजुटता के साथ अपने संघर्ष को तेज करना होगा तथा बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के समता मूलक समाज के स्वप्न को साकार करना होगा ,यही सही मायनों में उनके प्रति श्रृद्धांजलि होगी ।
